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Thursday, May 25, 2017 09:54 PM     English | हिंदी

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होम जिरह
जिरह: परमाणु हादसे में जिम्मेदारी का दायरा बढ़ाना सही है?
नीलेंद्र कुमार, निदेशक, एमिटी लॉ स्कूल
सबसे अहम तो यही है कि परिचालक और आपूर्तिकर्ता को एक अनुबंधीय देनदारी से जोड़ा गया है। उपबंध 4 (4) में किया गया बदलाव भी बेहद अहम है।
जी डी मित्तल, टीम लीडर, पीएम डाइमेंशंस
भारत में परमाणु उद्योग का दामन एकदम पाक साफ रहा है। ऐसे में उन पर ज्यादा सख्ती करके इस उद्योग की तरक्की प्रभावित हो सकती है।
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जिरह: क्या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में कम सार्वजनिक हिस्सेदारी ही ठीक है?
निर्मल जैन, अध्यक्ष, इंडिया इन्फोलाइन लि.
हमें हाल ही में चीन के एग्रीकल्चर बैंक ऑफ चाइना (एगबैंक) के आईपीओ से सबक लेना चाहिए।
यू डी चौबे, महानिदेशक, स्कोप
करीब 4,000 सरकारी कंपनियों में से एक फीसदी सूचीबद्घ भी हैं जिनके पास कुल बाजार पूंजीकरण का 25 फीसदी है
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जिरह: नई पेंशन योजना में सुधार की है जरूरत?
डी स्वरुप, पूर्व अध्यक्ष, पीएफआरडीए
सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) को लंबी अवधि की बचत योजना के बजाय कर बचत के वित्तीय उपकरण के तौर पर देखा जाता है
बलराम पी भगत, सीईओ, यूटीआई रिटायरमेंट सॉल्यूशंस लिमिटेड
रिटायरमेंट पर आपकी राशि के एक हिस्से को एकमुश्त के तौर पर निकाला जा सकता है। बाकी की पूंजी का भुगतान सालाना पेंशन भत्ते के तौर पर दिया जा सकता है
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जिरह: क्या एमऐंडए के लिए सेबी की सिफारिशें सही हैं?
कौशिक चटर्जी, टाटा स्टील समूह के सीएफओ
निवेशकों को भरोसा दिलाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि भविष्य में अधिग्रहण के लिए नियामक स्तर पर एक कारगर तंत्र मौजूद हो। समिति की सिफारिशें इसी दिशा में एक कदम हैं
के बालकृष्णन, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक लाजार्ड इंडिया
एक आक्रामक स्थिति में गलत इरादों वाला कोई भी शेयरधारक अपने हित साधने लायक हिस्सेदारी हासिल कर सकता है। इस लिहाज से 15 फीसदी या फिर 25 फीसदी की सीमा क्या डराएगी
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जिरह: क्या निजी अस्पताल छल कर रहे हैं?
जी श्रीनिवासनचेयरमैन-कम-एमडी, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लि.
बढ़ते प्रीमियम को देखते हुए एक स्थिति यह भी आ सकती है कि आम आदमी के लिए स्वास्थ्य बीमा दूर की कौड़ी नजर आने लगे
डॉ. परवेज अहमद सीईओ और एमडी मैक्स हेल्थकेयर इंस्टीट्यूट लि.
हम मानते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं के इस पूरे तंत्र में सरकारी बीमा कंपनियां एक अहम कड़ी है और वे लगातार नुकसान नहीं झेल सकतीं
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जिरह: क्या रिटेल में एफडीआई सही है?
गोविंद श्रीखंडे, सीईओ, शॉपर्स स्टॉप
एफडीआई को लेकर बहस सकारात्मक पहलुओं को न लेकर नकारात्मक बिंदुओं के इर्द-गिर्द हो रही है। कहा जा रहा है कि इससे छोटे कारोबारियों को नुकसान होगा और उनकी आजीविका संकट में पड़ जाएगी।
प्रवीन खंडेलवाल,महा सचिव कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स
सरकार को बहुब्रांड खुदरा कारोबार में एफडीआई को मंजूरी देने के बजाय मौजूदा खुदरा कारोबार के ढांचे को सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) की तर्ज पर विकसित करना चाहिए।
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जिरह: क्या केंद्र ही निपटे नक्सलियों से?
विजयरामा राव पूर्व निदेशक, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए नीतिगत ढांचा तैयार करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है, लेकिन कानून-व्यवस्था के अलावा सामाजिक-आर्थिक मसले सुलझाने का काम राज्य सरकारों का है।
मनीष तिवारी प्रवक्ता, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी
यदि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कहते हैं कि नक्सलवाद की समस्या से केंद्र सरकार को निपटना चाहिए, तो उन्हें कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। यदि वे इस समस्या की वजह से तनाव में हैं, तो उनके लिए यही बेहतर है।
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क्या स्वतंत्र निदेशकों की भी बनती है जिम्मेदारी?
राजीव चंद्रशेखर, सांसद व अध्यक्ष, जुपिटर कैपिटल
स्वतंत्र निदेशक अपने दायित्व से पल्ला नहीं झाड़ सकते, दुनिया भर में स्वतंत्र निदेशकों की जिम्मेदारी तय की गई है तो भारत में भी ऐसा ही होना चाहिए।
एस महालिंगम, सीएफओ और कार्यकारी निदेशक, टीसीएस
स्वतंत्र निदेशकों के लिए अलग से जिम्मदारियां तय होने से वे ज्यादा सक्षम होकर कार्य कर पाएंगे जिससे दुर्घटनाओं की रोकथाम में मदद मिलेगी
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क्या दबाव में संशोधन किया गया डीटीसी में?
टी एन पांडेय (पूर्व चेयरमैन, सीबीडीटी)
सरकार ने कर सुधार और नई प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) को लेकर जो रवैया दिखाया है उससे आम आदमी को निराशा ही हुई है। पी चिदंबरम की अगुआई में 1996 में सरकार ने इसे शुरू किया था।
प्रणव सायता (टैक्स पार्टनर, अर्न्स्ट ऐंड यंग)
वित्त मंत्रालय ने हालिया दौर में जो सबसे कारगर कदम उठाए हैं उनमें से एक नई प्रत्यक्ष कर संहिता भी है जो करदाताओं के लिए क्रांतिकारी साबित होगी।
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क्या 25 फीसदी हिस्सेदारी से होगा भला
गोविंद शंकरनारायणन (मुख्य वित्त अधिकारी, टाटा कैपिटल लिमिटेड)
किसी भी कंपनी की सार्वजनिक सूचीबद्धता उसकी विकास यात्रा का एक अहम पड़ाव होती है। यह कदम इस बात की ओर संकेत करता है कि कंपनी के मालिकान उद्यमिता की अपनी इस विकास यात्रा में दूसरे लोगों को भी एक कीमत पर अपने साथ शामिल करना चाहते हैं।
अबिजेर दीवानजी (ईडी, कॉर्पोरेट फाइनैंस-केपीएमजी इंडिया)
सार्वजनिक सूचीबद्धता किसी भी कंपनी की यात्रा का एक अहम पड़ाव होती है। यह कदम इस बात की ओर संकेत करता है कि कंपनी के मालिकान उद्यमिता की अपनी इस विकास यात्रा में दूसरे लोगों को भी एक कीमत पर अपने साथ शामिल करना चाहते हैं।
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एमसीआई को खत्म करने से संभव होगा सुधार?
के श्रीनाथ रेड्डी अध्यक्ष, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया
एमसीआई की रूपरेखा में एक बार फिर से बदलाव लाने की जरूरत है क्योंकि यह स्वास्थ्य शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में कोई विशेष योगदान नहीं दे रही है
विनय अग्रवाल, पूर्व महासचिव, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन
स्वास्थ्य शिक्षा पर बेहतर नियंत्रण करने के लिए इस वैधानिक संस्था को खत्म करना जल्दबाजी होगी। ऐसे में नेताओं और नौकरशाहों का दबदबा बढ़ सकता है
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क्या दवा कंपनियों को बेचा जाना चाहिए?
परेश वैश (प्रबंध निदेशक, एल्वारेज ऐंड मार्शल इंडिया)
पिछले कुछ वर्षों में देश में दवा उद्योग में जबदरस्त तेजी देखने को मिली है और आगे भी इसके सालाना 12 से 13 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है। वर्ष 2007 में दवा बाजार 7 अरब डॉलर का था जिसके 2012 तक 13 से 14 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है।
डी जी शाह (महासचिव, इंडियन फार्मा अलायंस)
देसी दवा कंपनी पीरामल हेल्थकेयर के फॉर्म्यूलेशन कारोबार का अमेरिकी कंपनी एबट द्वारा किए गए अधिग्रहण से एक बार फिर बहस छिड़ गई है कि वैश्विक दवा कंपनियों की भारतीय जेनेरिक दवा कंपनियों में दिलचस्पी के क्या निहितार्थ हो सकते हैं।
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क्या ट्राई का पक्ष सही है?
एस सी खन्ना (महासचिव - एयूएसपीआई)
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की सिफारिशें सुधारवादी, संतुलित हैं और सबसे अहम बात है कि इससे स्पेक्ट्रम का सही इस्तेमाल हो पाएगा।
राजन मैथ्यूज (महानिदेशक - सीओएआई)
वर्ष 2008 में दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने स्पेक्ट्रम आवंटन और कीमत निर्धारण के लिए बहुस्तरीय समिति गठित की थी।
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क्या 3 जी की बोली अनुमान से ज्यादा है?
कुणाल बजाज (पार्टनर और डायरेक्टर इंडिया - एनालिसिस मैसन लिमिटेड)
ऐसे माहौल में जब 3 जी लाइसेंस हासिल करने के लिए दूरसंचार कंपनियां आधार मूल्य से पांच गुना अधिक तक भुगतान करने के लिए तैयार हैं तो यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि क्या 3 जी के लिए ये कंपनियां कुछ ज्यादा ही रकम खर्च कर रही हैं।
संदीप लड्ठा (कार्यकारी निदेशक - प्राइसवाटरहाउस कूपर्स)
विकसित देशों में करीब एक दशक पहले ही शुरू हो चुकी 3 जी सेवाओं के बाद अब भारतीय सरकार भी तमाम बहसबाजी और चर्चाओं के दौर के बाद 2100 मेगाहट्र्ज फ्रीक्वेंसी बैंड में 3 जी स्पेक्ट्रम बेचने की तैयारी कर रही है।
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क्या देश में होना चाहिए खेल नियामक?
नंदन कामत (सह-संस्थापक - गोस्पोर्ट्स)
वक्त की जरूरत नियामक ताजा विवादों के मद्देनजर कहा जा सकता है कि भारतीय खेल अपने अब तक के सबसे बड़े वित्तीय और राजनीतिक संकट से गुजर रहे हैं।
लोकेश शर्मा (प्रबंध निदेशक - टीसीएम स्पोर्ट्स मार्केटिंग कंपनी)
आजादी से काम करने दो जब से आईपीएल नीलामी में गड़बड़ियों की बात सामने आई है तब से मीडिया और राजनेताओं ने इस पर हल्ला बोल दिया है। भ्रष्टाचार से लेकर मैच फिक्सिंग तक हर तरह के आरोपों से हमला किया जा रहा है।
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क्या विनिर्माण क्षेत्र बनाना आदर्श विचार है?
धर्मकीर्ति जोशी (मुख्य अर्थशास्त्री, क्रिसिल)
रफ्तार बढ़ाने का सही मौका पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी रफ्तार से दुनिया भर को चौंकाया है।
एम के पंधे (सदस्य- पोलित ब्यूरो, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी)
कारोबारियों का ही होगा फायदा देश की राष्ट्रीय विनिर्माण नीति पर तैयार डीआईपीपी का परामर्श पत्र देश में उद्योगों को बढ़ावा देने के बजाय अराजकता का माहौल पैदा करेगा।
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क्या पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट उचित कदम है?
राकेश भरतिया (मुख्य कार्यकारी अधिकारी, इंडिया ग्लाईकॉल्स)
खर्च का रखना होगा खयाल सरकार ने एक बार फिर गैसोलीन के साथ 5 फीसदी एथेनॉल मिलाए जाने के अपने इरादे को दोहराया है। पिछले दशक में सरकार ने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की योजना को देश भर में लागू करने की कई कोशिशें कीं, लेकिन वह कामयाब नहीं हो सकी।
जी के सूद (एथेनॉल प्रमोशन सब-कमिटी, आईएसएमए के चेयरमैन)
पेट्रोलियम पर निर्भरता होगी कम इस बात में कोई संदेह नहीं है कि वाहनों का ईंधन पर्यावरण प्रदूषण के लिए जिम्मेदार सबसे बड़े कारणों में से एक है। ज्वलनशीलता बढ़ाने के लिए गैसोलीन में एमटीबीई ऑक्सिजेनरेटर का इस्तेमाल किया जाता है। यह कैंसरजनक और नॉन-बायोडिग्रेडेबल माना जाता है।
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क्या विदेशी शिक्षा संस्थान विधेयक से फायदा होगा?
बी राज - कंट्री हेड एवं निदेशक (स्टैमफोर्ड इंडिया एजुकेशन सेंटर)
निजी निवेश से गिरेगा देश में उच्च शिक्षा का स्तर विदेशी शैक्षणिक संस्थान विधेयक, 2010 को अगर उच्च शिक्षा में मौजूदा खामियों के साथ पारित कर दिया जाता है तो इससे उच्च शिक्षा का स्तर गिरेगा और शिक्षण व्यवस्था में भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलेगा।
बी एस सहाय - निदेशक (एमडीआई, गुड़गांव)
देशी संस्थान भी कर सकेंगे विदेशी मानक हासिल विदेशी शिक्षण संस्थान (प्रवेश व परिचालन नियमन) विधेयक, 2010 की हमारे साथ-साथ ज्यादातर देसी संस्थानों ने तारीफ की है। स्वस्थ प्रतिस्पध्र्दा मुल्क के विकास के लिए काफी अच्छी बात होती है। हमने टेलीकॉम, आईटी और ऑटो जैसे कई क्षेत्रों में इसके फायदे को देखा है।
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क्या परमाणु दायित्व विधेयक लाना जाना सही है?
जी बालाचंद्रन (विजिटिंग फेलो इस्टीटयूट फॉर डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस)
विपक्षी खासकर वामपंथियों पार्टी के कड़े तेवर को देखते हुए सरकार ने न्यूक्लियर डैमेज बिल 2010 को पेश करने से अपने हाथ खींच लिए हैं। हालांकि, सकारात्मक बात यह है कि सरकार अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करेगी और भारत के नागरिक परमाणु कार्यक्रम और भारतीय नाभिकीय उद्योग के हितों को ध्यान में रखकर इस विधेयक को जल्द से जल्द पेश करने की कोशिश करेगी।
करुणा रैना (एनर्जी कैंम्पेनर, ग्रीनपीस इंडिया)
सरकार ने कुछ अपरिहार्य कारणों से नाभिकीय जवाबदेही विधेयक (सीएनएल) टाल दिया है। कई लोगों का मानना है किसी तक नीकी खामी की वजह से सरकार ने इस विधेयक को संसद में पेश नहीं किया है, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि इस विधेयक को पेश किए जाने को लेकर सरकार की तैयारी अधूरी थी।
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क्या राहत पैकेज में कमी करने के लिए मौजूदा समय उपयुक्त है?
इंद्रनील सेनगुप्ता (अर्थशास्त्री, इंडिया रिसर्च - डीएसपी मेरिल लिंच लिमिटेड)
राहत पैकेज में कटौती से हर्ज नहीं अब जबकि अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिल रहे हैं, हमलोग यह मानकर चल रहे हैं कि सरकार को राहत पैकेज वापस ले लेना चाहिए। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि किसी मरीज को दवाई की जरूरत तब तक ही होती है जब तक वह बीमार है।
ए सुब्बा राव (समूह सीएफओ - जीएमआर ग्रुप)
अभी थोड़े और इंतजार की जरूरत अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए दिया गया राहत पैकेज स्टीरॉयड थेरेपी की तरह है, जिसके तहत कुछ टीके आपकी जान बचा सकते हैं, जबकि कुछ को रोक दिया जाना जानलेवा हो सकता है। सरकार को राहत पैकेज वापस लिया जाना चाहिए, इस बात पर उठ रहे विवाद को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
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क्या निजी स्कूल सरकारी स्कूलों से बेहतर हैं ?
विनोद रैना (सदस्य, राष्ट्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड)
घातक होगा प्राथमिक शिक्षा का निजीकरण कुछ लोग यह मांग कर रहे हैं कि सस्ते और गैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों में अनिवार्य शिक्षा के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के फंडों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
पार्थ जे शाह (अध्यक्ष, सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी)
निजी स्कूलों के बिना शिक्षा की बेहतरी असंभव मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा कानून के तहत सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह देश के हरेक बच्चे को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराए। लेकिन क्या शिक्षा पाने के लिए बच्चों को सरकारी स्कूल की शरण में जाना जरूरी है? क्या शिक्षा मुहैया कराने में यह बात ज्यादा अहमियत रखती है कि स्कूल सरकारी हैं या निजी?
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क्या आईपीसीसी के अनुमानों पर आगे भी विवाद होगा?
चंद्र भूषण (सहायक निदेशक, सेंटर फॉर साइंस ऐंड इनवायरनमेंट)
ग्लेशियर पिघल रहे, इससे इनकार नहीं जलवायु परिवर्तन की बात से इनकार करने वाले लोग पिछले सप्ताह बड़े आनंदित हो रहे थे। दरअसल संयुक्त राष्ट्र की अंतरसरकारी समिति (आईपीसीसी) की 2035 तक हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की भविष्यवाणी में एक चूक हो गई।
बेनी पीजर (निदेशक, ग्लोबल वार्मिंग, पॉलिसी फाउंडेशन)
पैनल की कार्यशैली में बदलाव की जरूरत पिछले 20 सालों से आईपीसीसी की एक के बाद एक रिपोर्ट में कई तरह की अफवाहों को आसरा दिया गया है। कई बार ऐसा देखा गया है कि आईपीसीसी जिन तथ्यों के सहारे अटपटे और खतरनाक निष्कर्षों पर पहुंचती है, उसमें संतुलन, पारदर्शिता और गहन अध्ययन का सख्त अभाव होता है।
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क्या रिजर्व बैंक को दरें बढ़ानी चाहिए?
धर्मकिर्ती जोशी - निदेशक और प्रधान अर्थशास्त्री, क्रिसिल लिमिटेड
ब्याज दरों में बढ़ोतरी की बन रही है गुंजाइश रिजर्व रिजर्व बैंक ने अक्टूबर में मौद्रिक नीति की तिमाही समीक्षा में सख्ती बरते जाने के संकेत दिए थे। रिजर्व बैंक के निर्णय से ऐसा लगा कि बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ाने के लिए पहले लिए गए कुछ निर्णयों में बदलाव किए जाएंगे। सुस्ती के दौरान कई ऐसे अनौपचारिक कदम उठाए गए थे जो आम तौर पर नहीं उठाए जाते।
चंद्रजीत बनर्जी - महानिदेशक, सीआईआई
अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं होगी दरों में बढ़ोतरी जैसे-जैसे भारत और बाकी दुनिया वैश्विक आर्थिक संकट से बाहर निकलने के संकेत दे रहे हैं, रिजर्व बैंक का काम और जटिल होता जा रहा है। आर्थिक सुधार अपने आप में इतनी मजबूत स्थिति में नहीं है कि ब्याज दर में अधिक बढ़ोतरी को झेल सके।
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क्या दवाओं की कीमत पर नियंत्रण जरूरी है?
दारा बी पटेल - महासचिव, इंडियन ड्रग्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन
सरकार ने बोझ बढ़ाने की कोशिश की है एनएलईएम-2003 की चयन शर्तों में कहा गया है, 'जरूरी दवाओं का चयन बीमारी की प्रबलता, प्रभावोत्पादकता और सुरक्षा पर प्रमाणन, और प्रतिस्पर्धी तुलनात्मक लागत प्रभावशीलता को ध्यान में रखते हुए किया गया।'
लीना मेंघानी - इंडिया कॉ-आर्डिनेटर, केम्पेन फॉर एक्सेस टु एशेंयिल मेडिसिंस
डीपीसीओ की समीक्षा किए जाने की है दरकार ईडीएल की सूची में शामिल दवा और टीके घरेलू रूप से हर समय और पर्याप्त मात्रा में, उचित खुराक में, और मरीजों एवं सरकार दोनों के लिए किफायती कीमतों पर उपलब्ध होने चाहिए।
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निर्यात पर नियंत्रण चाहता है कपड़ा उद्योग
गणेश राज
कपास निर्यात के लिए बुकिंग जारी है। अगर यही गति रही तो चालू कपास वर्ष में भारत से करीब 80 लाख गांठ (1 गांठ 170 किलो का) कपास निर्यात होने का अनुमान है।
निर्मल जैन
अभी तक जो संकेत मिल रहे हैं, उससे घरेलू बाजार में स्थिति गंभीर लग रही है। पिछले साल की तुलना में कपास की कीमतों में 15 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है। भारत में कपास वर्ष 1 अक्टूबर से 30 सितंबर तक चलता है।
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 मुनाफाखोरी-रोधी निकाय से ग्रहकों के हितों की होगी रक्षा?
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